पब्लिक मंच नेटवर्क, डबवाली (रवि मोंगा)
बिश्नोई मंदिर, चौटाला में चल रहे जांभाणी संस्कार शिविर के दूसरे दिन का शुभारंभ हवन-यज्ञ के साथ हुआ। इस अवसर पर बच्चों को हवन के धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व की जानकारी दी गई। बताया गया कि गाय के घी से हवन करने से वातावरण शुद्ध होता है, ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है तथा मच्छरों व हानिकारक कीटाणुओं का नाश होता है। साथ ही बिश्नोई धर्म के अनुसार प्रात:काल शीघ्र उठकर स्नान के बाद हवन करना दैनिक जीवन का पहला और महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है।
शिविर संयोजक अध्यापक रंगलाल बिश्नोई ने 'दारू-बीड़ी नशे से दूरी बना मेरे भाई रे, तेरी बीते उमरिया' भजन के माध्यम से बच्चों को नशे से दूर रहने, बुराइयों का त्याग करने तथा बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करने का संदेश दिया। उन्होंने बच्चों से इन शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
इस दौरान जांभाणी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. बनवारीलाल साहू (हनुमानगढ़), सेवानिवृत अध्यापक मनोहर लाल कड़वासरा तथा गंगा गांव से पधारे पर्यावरण प्रेमी चंद्रमोहन बिश्नोई का मंदिर समिति के अध्यक्ष मनफूल कालीराणा द्वारा फूलमालाओं से स्वागत किया गया।
अपने संबोधन में डॉ. बनवारीलाल साहू ने गुरु जम्भेश्वर भगवान के जन्म और बाल्यकाल की प्रेरणादायक लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गुरु जम्भेश्वर जी के जीवन से हमें संस्कार, अनुशासन और आदर्श नागरिक बनने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने बताया कि संस्कारवान व्यक्ति ही सुखी और सफल जीवन जी सकता है। साथ ही मोक्ष प्राप्ति के लिए नवण मंत्र के महत्व पर भी प्रकाश डाला।
पर्यावरण प्रेमी चंद्रमोहन बिश्नोई ने बच्चों को पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझाते हुए कहा कि पेड़-पौधों के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने बच्चों से शिविर के प्रत्येक सत्र को गंभीरता से लेने और बताई गई शिक्षाओं को आत्मसात करने का आह्वान किया। उन्होंने 'जीव दया पालनी' के सिद्धांत का पालन करने पर भी जोर दिया तथा जांभाणी साहित्य अकादमी और मंदिर समिति का आभार व्यक्त किया।
सेवानिवृत्त अध्यापक मनोहरलाल कड़वासरा ने कहा कि राजस्थान की मरुभूमि में गुरु जम्भेश्वर भगवान ने बढ़ते अत्याचार, जीव हत्या और वृक्षों की अंधाधुंध कटाई को देखते हुए बिश्नोई धर्म की स्थापना की थी। उन्होंने बताया कि आज पर्यावरण प्रदूषण विश्व की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है और इसके समाधान के लिए प्रकृति संरक्षण आवश्यक है।
हरे वृक्षों की रक्षा के लिए दिए गए ऐतिहासिक बलिदान:
मनोहरलाल कड़वासरा ने बच्चों को बिश्नोई समाज के ऐतिहासिक बलिदानों की जानकारी देते हुए बताया कि विक्रम संवत 1661 में राजस्थान के रामसड़ी गांव की दो महिलाओं कर्मा और गोरां ने वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। इसके अलावा तिलवासनी गांव की खीवणी खोखर, मोटोजी खोखर और नेतू नेण तथा पोलावास गांव के बुचोजी ऐचरा ने भी वृक्षों की रक्षा के लिए बलिदान दिया। उन्होंने विशेष रूप से वर्ष 1730 में जोधपुर के निकट खेजड़ली गांव में माता अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 स्त्री-पुरुषों और बच्चों द्वारा दिए गए ऐतिहासिक बलिदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह विश्व इतिहास में पर्यावरण संरक्षण के लिए दिया गया सबसे बड़ा बलिदान माना जाता है। उन्होंने बच्चों को पेड़ों की रक्षा करने और किसी भी स्थिति में वृक्षों की कटाई न होने देने का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया। इस अवसर पर सेवानिवृत्त कस्टम अधिकारी श्योपत कुमार खीचड़ ने बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर उच्च पदों तक पहुंचने तथा शिविर में दी जा रही शिक्षाओं को जीवन में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम का संचालन जांभाणी साहित्य अकादमी के जिला प्रभारी इंद्रजीत बिश्नोई ने किया। अकादमी सदस्य जीतराम पूनिया, आनंद कुमार तथा अध्यापक उदयपाल खीचड़ ने विभिन्न सेवा कार्यों में सहयोग प्रदान किया।
