पब्लिक मंच नेटवर्क, डबवाली (रवि मोंगा)
शहीद माता अमृता देवी बिश्नोई चौक में 363 पर्यावरण शहीदों और ब्रह्मलीन गो-ऋषि स्वामी राजेंद्रानंद जी महाराज के निमित्त आयोजित श्रीमद् जांभाणी हरि कथा के प्रथम दिवस का शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ हुआ।
कथा के प्रथम दिवस की शुरुआत स्वामी सुखदेव मुनि जी महाराज के शिष्य आचार्य अखिलेश मुनि जी ने श्री गुरु जंभेश्वर भगवान के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित व तिलक कर की। इसके पश्चात ग्राम वासियों और गणमान्य व्यक्तियों ने कथावाचक आचार्य अखिलेश मुनि जी, स्वामी सुखदेव मुनि जी एवं पूरी संगीत मंडली का माल्यार्पण व तिलक लगाकर आत्मीय स्वागत किया।
आचार्य अखिलेश मुनि जी ने कथा के दौरान शहीद माता अमृता देवी बिश्नोई सहित पर्यावरण रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले 363 शहीदों के अतुलनीय बलिदान को याद किया। साथ ही, उन्होंने ब्रह्मलीन स्वामी राजेंद्रानंद जी महाराज के जीवन-वृत्त पर प्रकाश डालते हुए उनके बताए मार्गों पर चलने की प्रेरणा दी। कथा के दौरान स्वामी सुखदेव मुनि जी ने हजूरी संतों की प्रसिद्ध साखी 'तारणहार थला सी रे आयो' सुनाकर श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।
बिश्नोई धर्म के नियमों व शब्दों की व्याख्या:
कथावाचक आचार्य जी ने बिश्नोई धर्म के 29 नियमों में से 5 प्रमुख नियमों की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने 'सेरा करो स्नान' नियम पर जोर देते हुए बताया कि ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करने से स्वास्थ्य उत्तम रहता है, मन में धार्मिक भावनाएं जागृत होती हैं और दिनभर शरीर में स्फूर्ति बनी रहती है। गुरु महाराज द्वारा उच्चारित शब्द-'ओउम् कंचन दानू, कछु न मानू मानू एक सुचिल स्नानू', का अर्थ समझाते हुए आचार्य जी ने बताया कि प्रात:कालीन पवित्र स्नान का आध्यात्मिक और शारीरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है।
संस्कारों और जीवन की नश्वरता का दिया संदेश बच्चों को मोबाइल से रखें दूर:
आचार्य जी ने वर्तमान समय की जरूरत पर बात करते हुए अभिभावकों को सीख दी कि बच्चों को मोबाइल की लत से दूर रखें और केवल आवश्यकता पड़ने पर ही इसका सीमित प्रयोग करने दें।
भजन से जगाई अलख:
आचार्य जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में 'कंचन वाली काया ऐ सैलानी, में तो पावणा' भजन प्रस्तुत किया। उन्होंने समझाया कि यह मानव शरीर नश्वर है और मनुष्य इस संसार में कुछ समय का मेहमान (सैलानी) है। इसलिए जीवन में अधिक से अधिक पुण्य, सामाजिक और धार्मिक कार्य करने चाहिए, ताकि जीव भवसागर से पार होकर बैकुंठ धाम को प्राप्त कर सके।
भारी संख्या में पहुंची संगत, शाम को हुआ भजन-कीर्तन:
इंद्रजीत बिश्नोई ने बताया कि कथा के प्रथम दिन डबवाली शहर के अलावा आसपास के गांवों—चौटाला, जोतांवाली, गंगा, अबूबशहर और सकता खेड़ा से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। संध्या समय 7 से 8 बजे तक आचार्य जी द्वारा आरती एवं मधुर भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया, जिसका संगत ने भरपूर आनंद उठाया। पूजा आरती की व्यवस्था सक्ताखेड़ा मंदिर के पुजारी पुजारी ओम विष्णु द्वारा बखूबी की गई। कथा के समापन पर महाआरती के बाद सभी श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।

