पब्लिक मंच नेटवर्क, डबवाली (रवि मोंगा)
शहीद माता अमृता देवी बिश्नोई चौक में 363 पर्यावरण शहीदों एवं ब्रह्मलीन गो-ऋषि स्वामी राजेंद्रानंद जी महाराज के निमित्त आयोजित श्रीमद् जाम्भाणी हरि कथा के दूसरे दिन श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा।
कथा की शुरुआत आचार्य अखिलेश मुनि जी ने भगवान के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर की। इसके बाद गाँव के प्रबुद्धजनों एवं डबवाली से पधारे अशोक कुमार भाम्भू द्वारा आचार्य जी, स्वामी सुखदेव मुनि जी एवं पूरी संगीत मंडली का तिलक लगाकर और माल्यार्पण कर भावभीना स्वागत किया गया।
आचार्य अखिलेश मुनि जी ने 'ओउम् विष्णु ओउम् विष्णु, विष्णु परमानन्दा' कीर्तन के साथ कथा का शुभारंभ किया। तत्पश्चात उन्होंने बिश्नोई धर्म के प्रमुख नियमों 'जीव दया पालणी' और 'रूंख लीलो नहीं घावे' की व्याख्या करते हुए कहा कि बिश्नोई समाज सदियों से जीव-जंतुओं की रक्षा और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित रहा है। बिश्नोई समाज कभी अपने सामने जीव हत्या सहन नहीं कर सकता।
इस संदर्भ में उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग सुनाया कि कैसे एक समय बिश्नोई भाइयों ने शिकारियों को हिरण का मांस पकाने के लिए तेल देने से साफ मना कर दिया था और अपनी जान की परवाह न करते हुए जीवों की रक्षा की।
363 शहीदों का ऐतिहासिक बलिदान किया याद
आचार्य जी ने परोपकार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए यह सुंदर श्लोक सुनाया-'तरवर सरवर संतजन, चौथा बरसे मेह'- यह ही परोपकारी होते हैं। उन्होंने खेजड़ली के ऐतिहासिक बलिदान का मार्मिक वर्णन करते हुए बताया कि जब जोधपुर के राजा अभय सिंह के मंत्री गिरधर भंडारी ने हरे पेड़ काटने के आदेश दिए, तब माता अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 बिश्नोई वीरों ने गुरु जंभेश्वर भगवान के नियमों का पालन करते हुए पेड़ों से लिपटकर अपने प्राण त्याग दिए, लेकिन एक भी हरा पेड़ नहीं कटने दिया।
गौ-ऋषि स्वामी राजेंद्रानंद जी को दी श्रद्धांजलि
कथा में ब्रह्मलीन स्वामी राजेंद्रानंद जी महाराज के गौ-सेवा कार्यों का स्मरण किया गया। आचार्य जी ने बताया कि स्वामी जी ने लाचार और निर्बल गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाकर अपने पैरों पर खड़ा किया। स्वामी जी के निमित्त जब आचार्य जी ने 'गुरुदेव दया करके मुझको अपना लेना' भजन सुनाया, तो उपस्थित संगत की आँखें नम हो गईं।
वाणी की मधुरता और सत्संग का महत्व
आचार्य जी ने श्रद्धालुओं को मोह-माया से दूर रहकर प्रभु भक्ति करने और सदैव मीठी वाणी बोलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कबीर दास जी का प्रसिद्ध दोहा सुनाया- 'कागा काको धन हरे, कोयल काको देय। मीठी बोली बोल के, जग अपनो करि लेय॥
स्वामी सुखदेव मुनि जी ने सुनाई विरह की साखी
कथा के दौरान स्वामी सुखदेव मुनि जी ने लूर की प्रसिद्ध साखी 'गिरधर गोकुल आव, गोपी रे संदेशो मोकलो' तथा विरह की साखियाँ सुनाईं। इसके साथ ही जब उन्होंने भजन 'अब लौट के आजा जंभदेव, तुझे तेरे भक्त पुकारते हैं' गाया, तो संपूर्ण वातावरण भक्तिमय हो गया।
कार्यक्रम के अंत में इंद्रजीत बिश्नोई ने दानदाताओं की सूची पढ़कर उनका आभार व्यक्त किया। उन्होंने कथावाचक आचार्य अखिलेश मुनि जी, स्वामी सुखदेव मुनि जी, संगीत मंडली, गंगा-यमुना की मातृशक्ति तथा दूर-दराज से पधारे सभी श्रद्धालुओं का धन्यवाद किया।संध्या आरती के पश्चात उपस्थित संगत में चने व मखाने का प्रसाद वितरित किया गया, जिसकी सेवा इंद्रजीत (सुपुत्र रामप्रताप रोहज) की तरफ से की गई। रात्रि में आरती, साखी और मधुर भजनों के साथ भव्य जागरण का आयोजन हुआ, जिसमें संगत ने देर रात तक हरिनाम का आनंद लिया।

